जागता झारखंड : अपने जीवन की आठ दशकों की यात्रा को सौंदर्य एवं संयम के साथ पूर्ण कर लेने के बाद भी जालिब वतनी आज भी अपने उत्साह और दृढ़ संकल्प में युवाओं को मात देते प्रतीत होते हैं। वे झारखंड के उन सिद्धहस्त एवं सम्मानित उर्दू के कवियों में गिने जाते हैं जिनकी कविताएँ समय के साथ और भी निखरती चली जाती हैं। उनका नवीनतम काव्य-संग्रह “उड़ान” जून 2025 में पाठकों के समक्ष आया है जो उनके वैचारिक और कलात्मक सफर की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बनकर उभरा है।
“उड़ान” का शीर्षक स्वयं कवि की ऊँची सोच, उदात्त भावनाओं और अंतरात्मा की बेचैनी का सशक्त प्रतीक है। इस संग्रह का नाम कवि की एक अत्यंत सुंदर और अर्थगर्भित पंक्ति पर रखा गया है :
रुकना पड़े न राह-ए-फलक में उड़ान को
या रब ! उठा दे ज़रा और आसमान को
यह शेर कवि की उड़ती हुई सोच और उसके अदम्य साहस का जीवंत प्रमाण है। जालिब वतनी की यह उड़ान न केवल शब्दों की ऊँचाइयों को छूती है बल्कि पाठक की भावनाओं को भी नई ऊँचाई प्रदान करती है।
“उड़ान” के प्रकाशन के तुरंत बाद ही यह संग्रह स्थानीय एवं राष्ट्रीय स्तर के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की सुर्ख़ियों में आ गया। साहित्य और ज्ञान के रसिकों ने इस संग्रह को मानो मोतियों की तरह चुनना शुरू कर दिया। उन्हीं दुर्लभ मोतियों में से एक प्रति मेरे हाथ भी लगी जिससे लाभ उठाना मेरे लिए गर्व का विषय है।
यह प्रसंग 22 जून 2025 को राँची के लालपुर के होटल सिटी पैलेस में जनवादी लेखक संघ के छठे ज़िला सम्मेलन में घटित हुआ। वहाँ मुझे “जनवाद और उसके चुनौतियाँ” विषय पर सेमिनार प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इसी कार्यक्रम के दौरान जालिब वतनी की पुस्तक “उड़ान” का लोकार्पण भी सम्पन्न हुआ।उसी समारोह में मेरी कविवर से पहली भेंट हुई और यह मेरे लिए सौभाग्य की बात रही कि उन्होंने अपने हस्ताक्षरयुक्त एक प्रति मुझे भेंटस्वरूप प्रदान की।
इस काव्य-संग्रह पर अपने विचार प्रकट करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है क्योंकि यह मात्र कविताओं का संकलन नहीं बल्कि जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों, राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना और मानवता की भावना का सजीव दर्पण है।
जालिब वतनी की कविता में शास्त्रीय परंपरा के साथ-साथ आधुनिक संवेदनशीलता का सुंदर मेल दिखाई देता है। उनका लहजा सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है। वे अपनी कविताओं के माध्यम से पाठक के हृदय में आशा, साहस और सामाजिक जागरूकता जगाने की कला भली-भांति जानते हैं।
“उड़ान” जालिब वतनी के जीवन भर की काव्य साधना का निचोड़ है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक वैचारिक धरोहर सिद्ध हो सकती है। इस संग्रह के द्वारा कवि ने केवल अपने कल्पना लोक की उड़ान को व्यक्त नहीं किया बल्कि पाठक को भी अपने यात्रा में सहभागी बना लिया है।
कविवर जालिब वतनी का यह काव्य-संग्रह “उड़ान” महज शब्दों की श्रृंखला नहीं बल्कि भावनाओं, संवेदनाओं और सामाजिक चेतना की कोमल चित्रावलियाँ हैं।
इसके अध्ययन के दौरान मेरी दृष्टि एक ऐसी कविता पर ठहर गई जिसके अशआर ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया :
गीत पत्थर को सुना
रेत पर रंग चढ़ा
चाँद सूरज को निचोड़
आबदोज़ों की तरह
ये पंक्तियाँ केवल सरल ही नहीं बल्कि अपने भीतर गहन अर्थ भी समेटे हुए हैं। इस कविता में कवि ने रूपकों और प्रतीकों के माध्यम से एक ऐसी सृजनात्मक दुनिया रची है जहाँ दिखने में असंभव लगने वाली बातें भी संभव हो उठती हैं। पत्थर को गीत सुनाना, रेत पर रंग चढ़ाना और चाँद-सूरज को निचोड़ना ये सब प्रतीक उस क्रांतिकारी रचनात्मक शक्ति की ओर संकेत करते हैं जो जालिब वतनी के अंतर्मन में विद्यमान है।
ऐसे अवसर पर उर्दू के सुप्रसिद्ध आलोचक अल्ताफ़ हुसैन हाली की वह राय स्मरण हो आती है जो उन्होंने कविता की अर्थवत्ता और उद्देश्यपूर्णता के संदर्भ में दी थी। हाली ने प्रेम आधारित कविताओं, ग़ज़लों और क़सीदों के उन पक्षों की तीखी आलोचना की थी जो केवल भावनात्मक विलासिता के द्योतक हों। उनके शब्द थे :
“ऐसी शायरी सड़ांध में संडास से भी बदतर है।”
हाली का मानना था कि केवल मनोरंजन के लिए रची गई कविताएँ जिनमें यथार्थ का अभाव हो वह न तो राष्ट्र के काम आती हैं और न ही समाज के। इसके विपरीत वे काव्य रचनाएँ, जो सत्य, सामाजिक जागरूकता और क़ौमी सुधार की भावना से सराबोर हों वास्तव में गर्व और सम्मान की अधिकारी हैं।
जालिब वतनी की कविता भी इसी कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती दिखाई देती है। उनकी एक हृदय को स्पर्श करने वाली रचना की यह पंक्ति देखिए :
सब लोग जी रहे हैं यहाँ के हिसाब से
होगा वहाँ हिसाब, वहाँ के हिसाब से
यह शेर न केवल इस दुनिया के पाखंड और क्षणिक स्वार्थों को उकेरता है बल्कि एक सर्वोच्च न्याय-व्यवस्था की ओर भी संकेत करता है जहाँ “वास्तविक हिसाब” लिया जाएगा। यह पंक्तियाँ नैतिक और धार्मिक दृष्टि के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता की भी प्रतीक हैं।
जालिब वतनी की कविता में कोई बनावट नहीं बल्कि वह एक सच्चे दिल की पुकार है जो पाठक के हृदय पर सीधा असर करती है और उसकी सोच को झकझोर देती है। उनकी रचनाओं में हाली के काव्य और साहित्य के सिद्धांत की स्पष्ट झलक दिखाई देती है जहाँ “क़ौम की इस्लाह” (राष्ट्र का नैतिक-सामाजिक सुधार) ही कविता का वास्तविक उद्देश्य बन जाता है।
साहित्य किसी क़ौम की चेतना का आईना होता है और कविता उस आईने की सबसे कोमल व संवेदनशील सतह। जालिब वतनी का नवीन काव्य संग्रह “उड़ान” इसी आईने में एक नई छवि की तरह उभरता है।
राँची में हुए लोकार्पण से पूर्व यह संग्रह पहली बार जून 2025 में ही अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) झारखंड और “हम धनबाद” के संयुक्त तत्वावधान में विमोचित हुआ था जिसमें विभिन्न विद्वान, साहित्यकार और पत्रकार शामिल हुए। इस अवसर पर जालिब वतनी की कविताओं को वैचारिक और साहित्यिक दृष्टि से भरपूर सराहा गया।
इस समारोह में डॉ. रऊफ़ शहरी ने बिल्कुल ठीक कहा कि जालिब वतनी के विषयों में उन “सकारात्मक मूल्यों की हिफ़ाज़त का शोकगीत” है जो समय की धूल में दब चुके हैं। उनका काव्य पढ़कर लगता है कि वे केवल कवि नहीं बल्कि एक संवेदनशील सजग प्रहरी और नीतिदर्शी भी हैं। वे रूमानी ख्वाबों से अधिक यथार्थ की ओर झुकाव रखते हैं और अपने पाठकों को भी उसी दिशा में सोचने को प्रेरित करते हैं।इसी समारोह में प्रोफेसर जमशेद क़मर ने उनके इस अनोखे शिल्प पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जालिब वतनी कविता को केवल सौंदर्य और प्रेम के बयान तक सीमित नहीं रखते बल्कि इसे समाज सुधार और उत्साहवर्धन का भी माध्यम बनाते हैं।
“उड़ान” की इन्हीं तमाम विशेषताओं को रेखांकित करते हुए इसी पुस्तक में ‘तक़रीज़’ (भूमिका) के रूप में जमशेद क़मर लिखते हैं :
“मेरी नज़र में जालिब वतनी एक साथ अतीत, वर्तमान और भविष्य के आधुनिकतावादी कवि हैं। इसी वजह से वे हर दौर के आईना-दार और अपने परिवेश के लिए तरोताज़ा, ज़िंदा और नए महसूस होते हैं। उनके भीतर अनुभवों का एक समुद्र हिलोरें मार रहा है। उनके ये अनुभव, जिनमें रचनात्मक चेतना का अनुशासन है चौंका देने की क्षमता रखते हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ श्रोताओं के दिल और दिमाग को अपनी ओर खींचने पर मजबूर कर देती हैं…” (उड़ान, पृष्ठ 16)
इसी तरह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) झारखंड के केंद्रीय प्रतिनिधि एम ज़ेड ख़ान ने भी बिल्कुल ठीक कहा कि जालिब वतनी की कविता “महज़ एहसासों और जज़्बात की कविता नहीं बल्कि ज़िंदगी को सच्चाई से रूबरू कराती है।”
अंततः “उड़ान” जालिब वतनी की उस काव्य यात्रा की प्रतीक पुस्तक है जो अपने में उत्साह, सत्य और सामाजिक चेतना का सुंदर समन्वय समेटे हुए है। अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) और अन्य साहित्यिक संस्थाओं द्वारा इसे दिया गया सम्मान न केवल कवि के आत्मविश्वास को पुष्ट करता है बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि उर्दू कविता आज भी जीवंत है और नई दिशाओं में निरंतर पंख पसार रही है। साथ ही यह इस हक़ीक़त की याद भी दिलाती है कि :
जानता हूँ सर क़लम करती है एक ही वार से
फिर भी होता है क़लम, मज़बूततर तलवार से।
डॉ. अशरफ़ अली
ashrafalimehadvi@gmail.com








