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पाकुड़ का ‘जादुई’ प्रशासन: जहाँ पहाड़ पहियों पर चलते हैं और कानून ‘मौन साधना’ में है !

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जागता झारखंड संवाददाता पाकुड़ :- अगर आप अजूबों की तलाश में हैं, तो दुनिया के सात अजूबों को भूल जाइए और पाकुड़ की सड़कों पर कदम रखिए। यहाँ आपको विज्ञान और कानून के तमाम नियमों को धता बताते ‘चलते-फिरते पहाड़’ दिखेंगे। ये ट्रक नहीं, बल्कि खनिज संपदा से लदे ‘बाहुबली’ हैं, जिन्हें जिला प्रशासन की ‘दिव्य दृष्टि’ का ऐसा कवच प्राप्त है कि वे सब कुछ देखते हुए भी ‘अदृश्य’ बने रहते हैं।

पाकुड़ में इन दिनों ओवरलोडिंग का ऐसा ‘महोत्सव’ चल रहा है कि महान वैज्ञानिक न्यूटन भी अपनी कब्र में करवटें बदल रहे होंगे। जिस ट्रक की क्षमता महज 10 टन है, उस पर 30 टन पत्थर लादकर उसे सड़कों का सीना चीरने के लिए छोड़ दिया जाता है। परिणाम यह है कि पाकुड़ की सड़कें अब गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। सड़कों की हालत देखकर ऐसा लगता है जैसे वे प्रशासन से अपनी आखिरी सांसें गिनते हुए रहम की भीख मांग रही हों।

ऐसा प्रतीत होता है कि जिला प्रशासन ने महात्मा गांधी के तीन बंदरों के सिद्धांत को एक नए और भ्रष्ट परिप्रेक्ष्य में अपना लिया है: “अवैध माइनिंग मत देखो, ओवरलोडिंग मत सुनो और भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ मत बोलो।”

हैरानी की बात तो यह है कि यदि कोई आम आदमी बिना हेलमेट के सड़क पर निकल जाए, तो प्रशासन की फुर्ती चीते जैसी हो जाती है। चालान काटने की रफ्तार ऐसी कि रिकॉर्ड टूट जाएं। लेकिन जब पत्थर माफियाओं के विशालकाय ट्रक सड़कों को बर्बाद करते हुए गुजरते हैं, तो प्रशासन अचानक ‘ध्यान मुद्रा’ में चला जाता है। शायद इन ट्रकों को देखने के लिए जिस ‘विशेष चश्मे’ की जरूरत होती है, उसका लेंस ‘सुविधा शुल्क’ से बना है ।

पाकुड़ की सड़कों पर उड़ने वाली धूल अब यहाँ के निवासियों के लिए ‘मुफ्त का फेशियल’ बन चुकी है। लेकिन इस धूल के पीछे छिपा सच भयावह है। लोगों के फेफड़े खराब हो रहे हैं, दमा और सांस की बीमारियाँ घर-घर पहुँच रही हैं, और पर्यावरण का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। पर साहब! प्रशासन तो शायद किसी लंबी छुट्टी पर है या फिर ‘कागजी खानापूर्ति’ की फाइलों में ही विकास की गंगा बहा रहा है।

मीडिया और जनता द्वारा बार-बार आगाह किए जाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। “खबर बेअसर” होने का यह सिलसिला साफ दर्शाता है कि यहाँ ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। खनिज माफिया खुश हैं, सड़कें बदहाल हैं और कानून के रखवाले अपनी कुर्सियों से चिपके हुए मौन सहमति दे रहे हैं।

पाकुड़ की जनता पूछ रही है साहब, क्या प्रशासन तभी जागेगा जब इन ओवरलोडेड ट्रकों की वजह से कोई बड़ा हादसा होगा और मासूमों की जान जाएगी? क्या तब फोटो खिंचवाने और जांच का नाटक करने के लिए प्रशासन अपनी ‘योग मुद्रा’ तोड़ेगा?

फिलहाल तो पाकुड़ में विकास का मतलब सिर्फ ‘धूल’ और ‘अवैध कमाई’ ही नजर आ रहा है। यह प्रशासन की लाचारी है या फिर माफियाओं के आगे आत्मसमर्पण, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

Jagta Jharkhand
Author: Jagta Jharkhand

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