Search
Close this search box.

बेटियाँ हमारी क़ौम की सबसे बड़ी ताक़त

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

क़िस्त – 1
इल्म की रोशनी और हमारी बेटियाँ

लेखक:  शमीम अहमद

कभी-कभी मैं सोचता हूँ हमारी क़ौम की सबसे बड़ी कमी क्या है? संसाधनों की कमी? सियासी प्रतिनिधित्व की कमी? या फिर आर्थिक पिछड़ापन?
दिल गवाही देता है कि हमारी सबसे बड़ी कमी सोच की कमी है ख़ास तौर पर बेटियों को लेकर। हम अक्सर कहते हैं कि हमारी तादाद बहुत है, लेकिन क्या हमारी ताक़त भी उतनी है? जब तक हमारी आधी आबादी यानी हमारी बेटियाँ पूरी तरह शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक हम चाहे जितना भी शिकायत कर लें, हालात नहीं बदलेंगे।
“इक़रा” से शुरू हुआ था सफ़र..
इस्लाम की पहली वही का शब्द था  “इक़रा” (पढ़ो)।
यह हुक्म सिर्फ़ मर्दों के लिए नहीं था। यह इंसान के लिए था।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: “इल्म हासिल करना हर मुसलमान मर्द और औरत पर फ़र्ज़ है।”
अगर दीन खुद इल्म पर इतना ज़ोर देता है, तो हम अपनी बेटियों को इल्म से दूर क्यों रखें?
आज भी देश के कई हिस्सों में मुस्लिम लड़कियों की स्कूली शिक्षा दसवीं के बाद रुक जाती है। सरकारी सर्वेक्षण बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कम है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने वर्षों पहले यह संकेत दिया था कि शिक्षा के मामले में मुस्लिम समाज को विशेष प्रयास की ज़रूरत है और इसमें सबसे अधिक प्रभावित तबका महिलाएँ हैं। यह केवल आँकड़ा नहीं, यह हमारी ज़िम्मेदारी है। एक अनपढ़ माँ और एक शिक्षित माँ का फर्क मैंने अपने जीवन में एक बात बहुत गहराई से देखी है। एक शिक्षित माँ पूरे घर का माहौल बदल देती है। वह बच्चों की पढ़ाई समझती है, स्वास्थ्य का ध्यान रखती है, आर्थिक फैसलों में समझदारी दिखाती है।
वह अपने बच्चों को केवल रोटी नहीं, सोच भी देती है।
इसके उलट, जब लड़की को पढ़ाया नहीं जाता, तो उसका आत्मविश्वास सीमित रह जाता है। वह अक्सर अपने अधिकारों से अनजान रहती है। और यही अनजाने में अगली पीढ़ी तक पहुँच जाता है। अगर हम एक पीढ़ी बदलना चाहते हैं, तो हमें बेटियों को बदलना होगा और बदलाव का पहला ज़रिया है शिक्षा।बराबरी की असली तालीम बराबरी का मतलब पश्चिमी बनना नहीं है। बराबरी का मतलब है अवसर की समानता।
हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) एक सफल व्यापारी थीं।
हज़रत आयशा (रज़ि.) इस्लामी ज्ञान की बड़ी आलिमा थीं—सैकड़ों सहाबा उनसे मसाइल पूछते थे।हमारा इतिहास गवाह है कि इस्लाम ने औरत को घर की चारदीवारी में क़ैद नहीं किया। उसने उसे इज़्ज़त, पहचान और अधिकार दिए। फिर आज हम क्यों डरते हैं जब हमारी बेटी डॉक्टर या अफ़सर बनने का सपना देखती है? समाज की आम दलीलें  और उनके जवाब।

अक्सर कहा जाता है
“लड़की ज़्यादा पढ़ेगी तो शादी में दिक्कत होगी।”
लेकिन क्या एक समझदार, शिक्षित लड़की बेहतर जीवनसाथी नहीं होती? कहा जाता है …“इतना खर्च क्यों करें, आख़िर उसे घर ही तो संभालना है।”लेकिन क्या घर संभालने के लिए समझदारी, आर्थिक ज्ञान और सामाजिक समझ की ज़रूरत नहीं? सच तो यह है कि हम खर्च से नहीं, सोच से डरते हैं।
आँकड़ों की सच्चाई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) और अन्य शैक्षिक रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि जहाँ लड़कियों की शिक्षा का स्तर बढ़ा है, वहाँ मातृ मृत्यु दर कम हुई है,बच्चों का पोषण बेहतर हुआ है।
घरेलू आय में वृद्धि हुई है और सामाजिक जागरूकता बढ़ी है। यानी बेटी की शिक्षा केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, सामुदायिक उन्नति का माध्यम है। मेरी समाज से एक सच्ची अपील मैं एक चिकित्सक हूँ। रोज़ मरीजों से मिलता हूँ। अक्सर देखता हूँ कि बीमारी से ज्यादा परेशानी अज्ञानता देती है। जब कोई माँ अपने बच्चे की बीमारी को समझ नहीं पाती, दवा का नाम नहीं पढ़ पाती, तो मुझे महसूस होता है कि असली इलाज सिर्फ़ दवा नहीं इल्म है। मैं अपने मुस्लिम भाइयों और बहनों से दिल से कहना चाहता हूँ
बेटियों को रोकिए मत। उन्हें दीन भी सिखाइए और दुनिया भी। उन्हें कुरआन भी पढ़ाइए और किताबें भी।
याद रखिए… अगर एक बेटी आगे बढ़ती है, तो वह अपने साथ पूरे परिवार को ऊपर उठाती है।
बदलाव घर से शुरू होगा बदलाव सरकार नहीं लाएगी।
बदलाव स्कूल नहीं लाएंगे। बदलाव हम लाएँगे…अपने घर से। आज रात अपनी बेटी से कहिए: बेटी, हम तुम्हारे साथ हैं। तुम पढ़ो, आगे बढ़ो। हमें तुम पर भरोसा है।” शायद यही एक वाक्य किसी ज़िंदगी की दिशा बदल दे।

अगली क़िस्त में:
हम बात करेंगे “रूढ़ियों की जंजीरें और मुस्लिम समाज की ज़िम्मेदारी”

Jagta Jharkhand
Author: Jagta Jharkhand

Leave a Comment

और पढ़ें