जागता झारखण्ड सईद अनवर : यह वाकया है, एक रेगिस्तान की तपती रेत में लिखी गई सबसे मुक़्क़दस और खून से सनी वह दास्तान, जो इंसाफ, हिम्मत और सच्चाई की मिसाल बन गई। कर्बला की कहानी शुरू होती है इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मोहर्रम जैसे ही शुरू होता है, एक सन्नाटा, एक ग़म और एक गहराई हर मुसलमान के दिल को छूने लगती है। ये महीना जश्न का नहीं, बल्कि एक ऐसी कुर्बानी को याद करने का है, जिसने पूरी मानवता को यह सिखाया कि सच के लिए खड़े होना ही असल ईमान है, चाहे इसकी कीमत जान देके ही क्यों न चुकानी पड़े। तभी तो इमाम हुसैन जंग की बेला में यह कहते हुए सुने गए “मैं मौत को जिल्लत की जिंदगी पर तरजीह देता हूं “इस वाकये की शुरुआत तब होती है जब यजीद ने ज़ुल्म की सारी हदें पार कर दी।हज़रत मोहम्मद के इंतकाल के बाद इस्लामी खिलाफत का सिलसिला शुरू हुआ। मगर वक्त के साथ सियासत में लोभ, ताकत और ज़ुल्म घर कर गया नबी के नवासे, हज़रत इमाम हुसैन जो मदीना में रहते थे, उन्हें पता चला कि दमिश्क में बैठा यज़ीद खुद को मुसलमानों का खलीफ़ा घोषित कर चुका है। मगर यह शख्स शराब, ज़ुल्म और व्यभिचार में लिप्त था। उसने इस्लाम की तालीमात को ताक पर रख दिया था।यज़ीद चाहता था कि हुसैन उसकी बैअत यानी वफादारी स्वीकार करें। मगर हुसैन जानते थे कि यज़ीद की हुकूमत इस्लाम के उसूलों की हत्या है। उन्होंने साफ कहा “जैसा यज़ीद है, उसके जैसे की बैअत करना इस्लाम का अपमान है।”हुसैन ने मदीना छोड़ने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपने करीबियों और घर वालों के साथ मक्का की ओर रुख किया। वहां से उन्हें कूफ़ा से निमंत्रण मिला लोग चाहते थे कि हुसैन आएं और ज़ालिम यज़ीद के खिलाफ उनका नेतृत्व करें।हुसैन चल पड़े कूफ़ा की ओर, लेकिन रास्ते में उन्हें कर्बला के वीरान मैदान में रोक लिया गया। यज़ीद की फौज ने उन्हें घेर लिया और पानी तक बंद कर दिया। उनके साथ सिर्फ 72 लोग थे उनमें बच्चे, बुज़ुर्ग, जवान, और औरतें भी थीं। सामने 40 हजार की यज़ीदी फौज। 10 मोहर्रम के दिन कर्बला का मैदान तारीख़ थी 10 मोहर्रम 61 हिजरी, (13 अक्टूबर 680 ईस्वी) वही दिन जिसे आज हम आशूरा कहते हैं।तीन दिन की प्यास, तपती रेत और हर तरफ घेराबंदी के बावजूद हुसैन और उनके साथियों ने झुकना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने एक-एक करके अपने अज़ीज़ों को कुर्बान होते देखा अली अकबर, कासिम, अब्बास, और यहां तक कि उनका छह महीने का मासूम बेटा अली असगर भी प्यास से तड़पकर शहीद हो गया।हुसैन ने खुद अपने मासूम बेटे को पानी के लिए उठाया, मगर यज़ीद की तरफ से तीर चला और बच्चे की गर्दन चीर दी।अंत में, इमाम हुसैन खुद मैदान में उतरे। अकेले, प्यासे, ज़ख्मी—मगर सर झुकाया नहीं। वो लड़े, आख़िरी सांस तक लड़े। और जब उन्हें शहीद किया गया, दुश्मनों ने उनका सिर भी तन से अलग कर दिया।मगर हुसैन की गर्दन झुकी नहीं उनका सिर भी सजदे की हालत में था।इसके बाद उनके परिवार की महिलाओं और बच्चों को कैद कर लिया गया। उन्हें दमिश्क की गलियों में घुमाया गया। मगर उन्होंने भी कभी यज़ीद को हक़दार नहीं माना। हज़रत ज़ैनब हुसैन की बहन ने यज़ीद के दरबार में खड़े होकर उसकी सत्ता को ललकारा।उन्होंने कहा: “ऐ यज़ीद! तेरा राज़ तो चंद दिनों का है, मगर हुसैन का नाम क़यामत तक ज़िंदा रहेगा!”मोहर्रम सिर्फ अज़ादारी या मातम का महीना नहीं है। ये हमें सिखाता है कि जब भी समाज में ज़ुल्म, अन्याय, अत्याचार और सत्ता का दुरुपयोग हो, वहां एक “हुसैन” खड़ा होना चाहिए।हर युग में यज़ीद अलग नामों से आता है कभी सत्ता के लोभी, कभी धर्म के नाम पर ज़ालिम, कभी आर्थिक शोषण करने वाले। और हर दौर की ज़रूरत है हुसैनी जज़्बे की जो सच बोले, जो डर से न झुके, जो इंसाफ की खातिर सब कुछ कुर्बान कर दे।हुसैन हारकर भी जीत गए, और यज़ीद जीतकर भी हार गया। कर्बला की मिट्टी आज भी पवित्र मानी जाती है क्योंकि वहाँ खून बहा इंसाफ के लिए, सच के लिए, ईमान के लिए।आज भी जब कोई मज़लूम आवाज़ उठाता है, तो लोग कहते हैं “हर जगह कर्बला है, हर दिन आशूरा है, और हर दिल में हुसैन ज़िंदा हैं।”









