प्रतिनिधि जागता झारखंड, कटिहार (बिहार)- रेलवे के गलियारों में भ्रष्टाचार का जो नंगा नाच चल रहा है, उसने अब प्रशासनिक नैतिकता और मर्यादा की तमाम सीमाओं को ध्वस्त कर दिया है। समाचार पत्रों में प्रमाणों के साथ लगातार खबरें प्रकाशित होने के बावजूद रेल प्रशासन का कुंभकर्णी नींद में सोए रहना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यहाँ ‘ऊपर से नीचे तक’ भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी जमी हुई हैं। यह केवल एक प्रशासनिक चूक या लापरवाही नहीं है, बल्कि रेल विभाग के वरीय अधिकारियों और रसूखदार निविदा धारकों के बीच पनपा एक ऐसा काला और अनैतिक गठजोड़ है, जो दिन-दहाड़े सरकारी राजस्व की डकैती कर रहा है। परिवहन विभाग के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए अधिकारियों की सुख-सुविधा के लिए सफेद नंबर प्लेट की निजी गाड़ियों का जिस बेधड़क अंदाज में इस्तेमाल हो रहा है, वह अब कोई रहस्य नहीं बल्कि विभाग के भ्रष्ट तंत्र का खुला विज्ञापन बन चुका है।इस पूरे प्रकरण की सबसे घिनौनी हकीकत निविदा प्रक्रिया (टेंडर) में छिपी है। अब यह पूरी तरह स्पष्ट होता जा रहा है कि निविदा का आवंटन नियमों या योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि ‘अवैध सेटिंग’ और आपसी साठगांठ के आधार पर किया जाता है। विभाग के वरीय पदाधिकारी केवल उन्हीं निविदा धारकों की फाइलों पर ध्यान देते हैं और उन्हें ही काम सौंपते हैं, जिनसे उनका गुप्त और अनैतिक आर्थिक संबंध है। यह एक ऐसा संगठित भ्रष्टाचार है जहाँ पदाधिकारी और ठेकेदार मिलकर तय करते हैं कि कैसे नियमों की धज्जियां उड़ानी है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार पीली प्लेट (वाणिज्यिक) वाहनों के स्थान पर सफेद नंबर प्लेट की निजी गाड़ियाँ लगाई जा रही हैं, ताकि निविदा धारक को मोटा मुनाफा हो और उसका एक हिस्सा उन साहबों की जेब में जाए जो इस अवैध खेल को अपना संरक्षण दे रहे हैं।पदाधिकारियों और इन चहेते ठेकेदारों की आपसी सहमति ने रेल विभाग को लूट का अड्डा बना दिया है। जब चयन की बुनियाद ही भ्रष्टाचार पर टिकी हो, तो वहाँ पारदर्शिता की उम्मीद करना बेमानी है। जनता के टैक्स के पैसे से अपनी तिजोरियां भरने वाले ये सफेदपोश अधिकारी अब मीडिया के सवालों और अपनी जवाबदेही से भी कतरा रहे हैं। इस रहस्यमयी चुप्पी ने जनता के बीच यह संदेश पुख्ता कर दिया है कि इस लूट की बहती गंगा में बड़े साहबों ने भी जमकर डुबकी लगाई है। यदि इस संगठित सिंडिकेट और भ्रष्ट गठजोड़ पर तत्काल लगाम नहीं कसी गई और इन चेहरों को बेनकाब कर जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो रेल प्रशासन की विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। यह वक्त है कि उच्च स्तरीय जांच हो और परिवहन विभाग को करोड़ों का चूना लगाने वाले इस ‘अधिकारी-ठेकेदार’ नेक्सस को जड़ से उखाड़ फेंका जाए।









